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चालीसाShivaShani

शिव चालीसा

शिव चालीसा भगवान शिव की स्तुति में रचित 40 छंदों का पाठ है। सोमवार और महाशिवरात्रि पर इसका पाठ शांति, विघ्ननिवारण और आध्यात्मिक अनुशासन के लिए किया जाता है।

शिव चालीसा

दोहा

जय गणेश गिरिजा सुवन मंगल मूल सुजान ॥

Jai Ganesh Girija Suvan | Mangal Mul Sujan ||

जय गणेश, गिरिजा-सुत, मंगल और बुद्धि के मूल।

दोहा

कहत अयोध्यादास तुम देहु अभय वरदान ॥

Kahat Ayodhyadas Tum | Dehu Abhay Varadan ||

अयोध्यादास कहते हैं — अभय वरदान दें।

चौपाई 1

जय गिरिजा पति दीन दयाला सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥

Jai Girija Pati Deen Dayala | Sada Karat Santan Pratipala ||

गिरिजा-पति की जय, दीनों पर दया करने वाले, संतों के रक्षक।

चौपाई 2

भाल चन्द्रमा सोहत नीके कानन कुण्डल नागफनी के ॥

Bhal Chandrama Sohat Nike | Kanan Kundal Nagphani Ke ||

भाल पर चंद्रमा सुशोभित; कानों में नागफन कुण्डल।

चौपाई 3

अंग गौर शिर गंग बहाये मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥

Ang Gaur Shir Gang Bahaye | Mundmala Tan Kshar Lagaye ||

गौर अंग, शिर से गंगा; मुण्डमाला और भस्म लगे शरीर।

चौपाई 4

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे छवि को देखि नाग मन मोहे ॥

Vastra Khal Baghambar Sohe | Chhavi Ko Dekhi Nag Man Mohe ||

बाघचर्म वस्त्र; छवि देख नाग मोहित।

चौपाई 5

मैना मातु की हवे दुलारी वाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥

Maina Matu Ki Have Dulari | Vam Ang Sohat Chhavi Nyari ||

मैना-कन्या की प्रिय, वाम अंग पर अद्वितीय छवि।

चौपाई 6

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥

Kar Trishul Sohat Chhavi Bhari | Karat Sada Shatrun Kshaykari ||

हाथ में त्रिशूल भारी; सदा शत्रुओं का संहार।

चौपाई 7

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥

Nandi Ganesh Sohai Tahan Kaise | Sagar Madhya Kamal Hain Jaise ||

नंदी-गणेश सागर के कमल की भाँति सुशोभित।

चौपाई 8

कार्तिक श्याम और गणराऊ या छवि को कहि जात न काऊ ॥

Kartik Shyam Aur Ganarao | Ya Chhavi Ko Kahi Jat Na Kaun ||

कार्तिकेय, श्यामा और गणराज — वर्णनातीत छवि।

चौपाई 9

देवन जबहीं जाय पुकारा तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥

Devan Jabahin Jay Pukara | Tab Hi Dukh Prabhu Aap Nivara ||

देवताओं के पुकारते ही दुःख निवारा।

चौपाई 10

किया उपद्रव तारक भारी देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥

Kiya Upadrav Tarak Bhari | Devan Sab Mili Tumhin Juhari ||

तारक उपद्रव करता था; देव सब मिलकर नमे।

चौपाई 11

तुरत षडानन आप पठायउ लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥

Turat Shadanana Aap Pathayau | Lavanimesh Mahan Mari Girayau ||

षडानन को भेजा; क्षणभर में मार गिराया।

चौपाई 12

आप जलंधर असुर संहारा सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥

Aap Jalandhar Asur Sanhara | Suyash Tumhar Vidit Sansara ||

जलंधर असुर का संहार; यश संसार में विख्यात।

चौपाई 13

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥

Tripurasur San Yuddh Machai | Sabahin Kripa Kar Leen Bachai ||

त्रिपुरासुर से युद्ध; कृपा कर सबको बचाया।

चौपाई 14

किया तपहिं भागीरथ भारी पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥

Kiya Tapahin Bhagirath Bhari | Purab Pratijna Tasu Purari ||

भगीरथ के तप की पूर्व प्रतिज्ञा पूरी की, पुरारी।

चौपाई 15

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥

Danin Mahan Tum Sam Kou Nahin | Sevak Stuti Karat Sadahin ||

दानी में तुम्हारे समान कोई नहीं; सेवक सदा स्तुति करते हैं।

चौपाई 16

वेद नाम महिमा तव गाई अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥

Ved Nam Mahima Tav Gai | Akath Anadi Bhed Nahin Pai ||

वेद तुम्हारी महिमा गाते; अकथ और अनादि हो।

चौपाई 17

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला जरत सुरासुर भए विहाला ॥

Prakati Udadhi Manthan Mein Jwala | Jarat Surasur Bhaye Vihala ||

समुद्र मंथन में ज्वाला; देवासुर व्याकुल।

चौपाई 18

कीन्ही दया तहं करी सहाई नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥

Kinhi Daya Tahan Kari Sahai | Nilkanth Tab Nam Kahai ||

दया कर सहायता की; नीलकण्ठ नाम प्रसिद्ध हुआ।

चौपाई 19

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥

Pujan Ramchandra Jab Kinha | Jeet Ke Lank Vibhishan Dinha ||

रामचन्द्र की पूजा से लंका जीत और विभीषण को राज्य।

चौपाई 20

सहस कमल में हो रहे धारी कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥

Sahas Kamal Mein Ho Rahe Dhari | Kinha Pariksha Tabahin Purari ||

सहस्र कमल अर्पण; पुरारी ने परीक्षा ली।

चौपाई 21

एक कमल प्रभु राखेउ जोई कमल नयन पूजन चहं सोई ॥

Ek Kamal Prabhu Rakheu Joi | Kamal Nayan Pujan Chahan Soi ||

एक कमल छिपाया; उन्होंने कमल-नेत्र अर्पित किया।

चौपाई 22

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥

Kathin Bhakti Dekhi Prabhu Shankar | Bhae Prasann Die Ichchhit Var ||

कठिन भक्ति देख प्रसन्न हुए; इच्छित वर दिया।

चौपाई 23

जय जय जय अनन्त अविनाशी करत कृपा सबके घट वासी ॥

Jai Jai Jai Anant Avinashi | Karat Kripa Sabke Ghat Vasi ||

अनंत अविनाशी की जय; सबके हृदय में वास कर कृपा करते हैं।

चौपाई 24

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥

Dusht Sakal Nit Mohi Satavai | Bhramat Rahaun Mohi Chain Na Avai ||

दुष्ट सताते हैं; चैन नहीं मिलता।

चौपाई 25

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥

Trahi Trahi Main Nath Pukaro | Yehi Avasar Mohi Aan Ubaro ||

त्राहि त्राहि नाथ! इस अवसर मुझे उबारें।

चौपाई 26

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो संकट से मोहि आन उबारो ॥

Lai Trishul Shatrun Ko Maro | Sankat Se Mohi Aan Ubaro ||

त्रिशूल ले शत्रु मारें; संकट से उबारें।

चौपाई 27

मात-पिता भ्राता सब होई संकट में पूछत नहिं कोई ॥

Mat-Pita Bhrata Sab Hoi | Sankat Mein Poochhat Nahin Koi ||

माता-पिता-भ्राता हैं, पर संकट में कोई नहीं पूछता।

चौपाई 28

स्वामी एक है आस तुम्हारी आय हरहु मम संकट भारी ॥

Swami Ek Hai Aas Tumhari | Aay Harahu Mam Sankat Bhari ||

एक आशा तुम्हारी; आकर भारी संकट हरें।

चौपाई 29

धन निर्धन को देत सदा हीं जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥

Dhan Nirdhan Ko Det Sada Hin | Jo Koi Janche So Phal Pahin ||

निर्धन को धन देते; जो माँगे सो फल पाए।

चौपाई 30

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥

Astuti Kehi Vidhi Karein Tumhari | Kshamahu Nath Ab Chook Hamari ||

कैसे स्तुति करूँ? चूक क्षमा करें, नाथ।

चौपाई 31

शंकर हो संकट के नाशन मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥

Shankar Ho Sankat Ke Nashan | Mangal Karan Vighn Vinashan ||

शंकर संकट नाशक, मंगलकारी, विघ्नविनाशक।

चौपाई 32

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं शारद नारद शीश नवावैं ॥

Yogi Yati Muni Dhyan Lagaven | Sharad Narad Shish Navaven ||

योगी-मुनि ध्यान लगाते; शारदा-नारद शीश नवाते।

चौपाई 33

नमो नमो जय नमः शिवाय सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥

Namo Namo Jai Namah Shivay | Sur Brahmadik Par Na Pay ||

नमः शिवाय — ब्रह्मादि भी पार न पाएँ।

चौपाई 34

जो यह पाठ करे मन लाई ता पर होत है शम्भु सहाई ॥

Jo Yah Path Kare Man Lai | Ta Par Hot Hai Shambhu Sahai ||

मन लगाकर पाठ करने पर शम्भु सहाय होते हैं।

चौपाई 35

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी पाठ करे सो पावन हारी ॥

Riniyan Jo Koi Ho Adhikari | Path Kare So Pavn Hari ||

ऋणी भी पाठ से पावन हो जाते हैं।

चौपाई 36

पुत्र हीन कर इच्छा जोई निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥

Putra Heen Kar Ichchha Joi | Nishchay Shiv Prasad Tehi Hoi ||

पुत्रहीन की इच्छा शिव कृपा से पूर्ण होती है।

चौपाई 37

पण्डित त्रयोदशी को लावे ध्यान पूर्वक होम करावे ॥

Pandit Trayodashi Ko Lave | Dhyan Purvak Hom Karave ||

त्रयोदशी को पंडित बुलाकर ध्यानपूर्वक होम कराएँ।

चौपाई 38

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥

Trayodashi Vrat Karai Hamesha | Take Tan Nahin Rahai Kalesha ||

त्रयोदशी व्रत से कलेश नहीं रहते।

चौपाई 39

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥

Dhoop Deep Naivedya Chadhave | Shankar Sammukh Path Sunave ||

धूप-दीप-नैवेद्य चढ़ाकर शंकर के सम्मुख पाठ सुनाएँ।

चौपाई 40

जन्म जन्म के पाप नसावे अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥

Janm Janm Ke Pap Nasave | Ant Dham Shivpur Mein Pave ||

जन्म-जन्म के पाप नष्ट; अंत में शिवपुर प्राप्ति।

चौपाई 41

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥

Kahain Ayodhyadas Aas Tumhari | Jani Sakal Dukh Harahu Hamari ||

अयोध्यादास कहते — आशा तुम्हारी; सकल दुःख हरें।

दोहा

नित्त नेम कर प्रातः ही पाठ करौं चालीसा ॥

Nit Nem Kar Pratah Hi | Path Karaun Chalisa ||

प्रातः नित्य नेम से चालीसा पाठ करूँ।

दोहा

तुम मेरी मनोकामना पूर्ण करो जगदीश ॥

Tum Meri Manokamana | Purn Karo Jagadish ||

मनोकामना पूर्ण करें, जगदीश।

शिव चालीसा के बारे में

शिव चालीसा हिंदू परंपरा का अत्यंत पवित्र स्तोत्र है, जो भगवान शिव को समर्पित है। इसके नियमित पाठ से भक्तों को दिव्य कृपा, मानसिक स्थिरता और नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षा प्राप्त होती है।

पाठ के लाभ

  • विघ्न, पाप और दुःख का नाश
  • मानसिक शांति और आध्यात्मिक शक्ति
  • स्वास्थ्य, समृद्धि और भक्ति की कृपा
  • कठिन ग्रहकाल में सुरक्षा

शुभ समय और विधि

सोमवार, प्रदोष, महाशिवरात्रि या सावन में पाठ करें। स्नान के बाद प्रातः या संध्या समय बेलपत्र और जल अर्पित करें।

ज्योतिषीय महत्व

नियमित पाठ मन को धार्मिक अनुशासन से जोड़ता है — जो सभी वैदिक उपायों की नींव है। भय के बजाय ईमानदार आचरण, सेवा और निरंतरता के साथ इसका अभ्यास करें।

संबंधित स्तोत्र और पाठ

स्तोत्रShivaShani

शिव लिङ्गाष्टकम्

शिव लिंग की आठ श्लोकीय स्तुति — ब्रह्मा, विष्णु और सभी ऋषियों द्वारा पूजित। सोमवार और महाशिवरात्रि को जन्म-दुःख, अहंकार और पाप नाश हेतु पाठ।

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स्तोत्रShivaShani

शिव ताण्डव स्तोत्रम्

रावण द्वारा रचित सत्रह श्लोकीय शिव स्तोत्र, जो महादेव के ताण्डव नृत्य का वर्णन करता है। शक्ति, भक्ति और सामान्य ग्रह शांति के लिए वैदिक ज्योतिष में प्रसिद्ध।

पाठ करें
चालीसाHanumanMangal · Shani

श्री हनुमान चालीसा

हनुमान चालीसा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित ४० चौपाइयों का एक अत्यंत प्रभावशाली पाठ है। प्रतिदिन इसका पाठ करने से जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं, बल और बुद्धि प्राप्त होती है, और शनि तथा मंगल के अशुभ प्रभावों से रक्षा होती है।

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