आदित्य हृदयम्
वाल्मीकि रामायण युद्ध काण्ड का 31 श्लोकीय सूर्य स्तोत्र, जो अगस्त्य ऋषि ने रावण युद्ध से पूर्व राम को दिया। वैदिक ज्योतिष में विजय, स्वास्थ्य और सूर्य महादशा का सर्वोत्तम उपाय।

चौपाई 1
ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्। रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्॥
Tato yuddhaparishrantam samare chintaya sthitam. Ravanam chagrato drishtva yuddhaya samupasthitam.
राम युद्ध में थके, चिन्तित, रावण को सामने देख युद्ध हेतु तैयार थे।
चौपाई 2
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्। उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवानृषिः॥
Daivataishcha samagamya drashtumabhyagato ranam. Upagamyabravirramamagastyo bhagavanrishih.
देवताओं सह ऋषि अगस्त्य युद्धभूमि में आए और राम से बोले।
चौपाई 3
राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम्। येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि॥
Rama rama mahabaho shrinu guhyam sanatanam. Yena sarvanarin vatsa samare vijayishyasi.
हे महाबाहो राम, यह सनातन गुह्य सुनो — इससे समस्त शत्रुओं पर विजय होगी।
चौपाई 4
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्। जयावहं जपेन्नित्यमक्षयं परमं शिवम्॥
Adityahridayam punyam sarvashatruvinashanam. Jayavaham japennityamakshayam paramam shivam.
पुण्य आदित्यहृदय सर्वशत्रुविनाशक, जयदायक, अक्षय, परम शिव है।
चौपाई 5
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम्। चिन्ताशोकप्रशमनं आयुर्वर्धनमुत्तमम्॥
Sarvamangalamangalyam sarvapapapranashanam. Chintashokaprashamanam ayurvardhanamuttamam.
सर्वोत्तम मंगल, पापनाशक, चिन्ता-शोक शामक, आयुर्वर्धक।
चौपाई 6
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्। पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्॥
Rashmimantam samudyantam devasuranamaskritam. Pujayasva vivasvantam bhaskaram bhuvaneshvaram.
उदित, देवासुर वन्दित विवस्वान्, भास्कर, भुवनेश्वर की पूजा करो।
चौपाई 7
सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः। एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः॥
Sarvadevatmako hyesha tejasvi rashmibhavanah. Esha devasuraganal lokan pati gabhastibhih.
सर्वदेवात्मक, तेजस्वी — किरणों से देवासुर और लोक पालन करता है।
चौपाई 8
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः। महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः॥
Esha brahma cha vishnushcha shivah skandah prajapatih. Mahendro dhanadah kalo yamah somo hyapam patih.
ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, इन्द्र, कुबेर, काल, यम, सोम, वरुण — सब वह है।
चौपाई 9
पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः। वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः॥
Pitaro vasavah sadhya hyashvinau maruto manuh. Vayurvahnih prajaprana ritukarta prabhakarah.
पितर, वसु, साध्य, अश्विनी, मरुत, मनु, वायु, अग्नि, प्राण, ऋतुकर्ता, प्रभाकर।
चौपाई 10
आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान्। सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः॥
Adityah savita suryah khagah pusha gabhastiman. Suvarnasadrisho bhanurhiranyareta divakarah.
आदित्य, सविता, सूर्य, खग, पूषा, गभस्तिमान्, स्वर्ण भानु, हिरण्यरेता, दिवाकर।
चौपाई 11
हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान्। तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्ताण्ड अंशुमान्॥
Haridashvah sahasrarichih saptasaptirmarichiman. Timironmathanah shambhustvashta martanda amshuman.
हरिदश्व, सहस्रार्चि, सप्तसप्ति, मरीचिमान्, तिमिरोन्मथन, शम्भु, त्वष्टा, मार्ताण्ड, अंशुमान्।
चौपाई 12
हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः। अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः॥
Hiranyagarbhah shishirastapano bhaskaro ravih. Agnigarbho-aditeh putrah shankhah shishiranashanah.
हिरण्यगर्भ, शिशिर, तपन, भास्कर, रवि, अग्निगर्भ, अदिति-पुत्र, शङ्ख, शिशिरनाशन।
चौपाई 13
व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः। घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथी प्लवङ्गमः॥
Vyomanathastamobhedi rigyajussamaparagah. Ghanavrishtirapam mitro vindhyavithi plavangamah.
व्योमनाथ, तमोभेदी, वेदपारग, वृष्टिदाता, जलमित्र, विंध्यवीथी, प्लवङ्गम।
चौपाई 14
आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः। कविर्विश्वो महातेजाः रक्तः सर्वभवोद्भवः॥
Atapi mandali mrityuh pingalah sarvatapanah. Kavirvishvo mahatejah raktah sarvabhavodbhavah.
आतपी, मण्डली, मृत्यु, पिङ्गल, सर्वतापन, कवि, विश्व, महातेजाः, रक्त, सर्वभवोद्भव।
चौपाई 15
नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः। तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्नमोऽस्तु ते॥
Nakshatragrahataranamadhipo vishvabhavanah. Tejasamapi tejasvi dvadashatmanna-mostu te.
नक्षत्र-ग्रह-ताराधिप, विश्वभावन, तेजस्वी — द्वादशात्मन् को नमस्कार।
चौपाई 16
नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः। ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः॥
Namah purvaya giraye pashchimayadraye namah. Jyotirgananam pataye dinadhipataye namah.
पूर्व-पश्चिम गिरि, ज्योतिर्गणपति, दिनाधिपति को नमस्कार।
चौपाई 17
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः। नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः॥
Jayaya jayabhadraya haryashvaya namo namah. Namo namah sahasramsho adityaya namo namah.
जय, जयभद्र, हर्यश्व, सहस्रांशु, आदित्य को नमस्कार।
चौपाई 18
नम उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः। नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः॥
Nama ugray viraya sarangaya namo namah. Namah padmaprabodhaya martandaya namo namah.
उग्र वीर सारङ्ग, पद्मप्रबोध, मार्ताण्ड को नमस्कार।
चौपाई 19
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे। भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः॥
Brahmeshanachyuteshaya suryayadityavarcase. Bhasvate sarvabhakshaya raudraya vapushe namah.
ब्रह्मेशानाच्युतेश, सूर्य, आदित्यवर्चस, भास्वत्, सर्वभक्ष, रौद्र वपु को नमः।
चौपाई 20
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने। कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः॥
Tamoghnaaya himaghnaaya shatrughnaayamitatmane. Kritaghnaghnaya devaya jyotisham pataye namah.
तमोघ्न, हिमघ्न, शत्रुघ्न, अमितात्मन्, कृतघ्नघ्न, ज्योतिषपति को नमः।
चौपाई 21
तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे। नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे॥
Taptachamikarabhaya vahnaye vishvakarmane. Namastamo-abhinighnaya ruchaye lokasakshine.
तप्तचामीकराभ, वह्नि, विश्वकर्मा, तमोऽभिनिघ्न, रुचि, लोकसाक्षि को नमः।
चौपाई 22
नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः। पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः॥
Nashayatyesha vai bhutam tadeva srijati prabhuh. Payatyesha tapatyesha varshatyesha gabhastibhih.
भूत नाश-सृष्टि करता; किरणों से पोषण, तापन, वर्षा करता है।
चौपाई 23
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः। एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्॥
Esha supteshu jagarti bhuteshu parinishthitah. Esha evagnihotram cha phalam chaivagnihotrinam.
सोते समय जागृत, सर्व में स्थित; अग्निहोत्र और उसका फल वह स्वयं है।
चौपाई 24
वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च। यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः॥
Vedashcha kratavashchaiva kraturam phalameva cha. Yani krityani lokeshu sarva esha ravih prabhuh.
वेद, यज्ञ, फल, लोककृत्य — सब का स्वामी रवि प्रभु है।
चौपाई 25
एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च। कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव॥
Enamapatsu krichchhreshu kantareshu bhayeshu cha. Kirtayan purushah kashchinnavasidati raghava.
हे राघव, संकट, कष्ट, वन, भय में पाठ करने वाला कभी निराश नहीं होता।
चौपाई 26
पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्। एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि॥
Pujayasvainamekagro devadevam jagatpatim. Etat trigunitam japtva yuddheshu vijayishyasi.
एकाग्र होकर देवदेव जगत्पति की पूजा करो; त्रिवार जप से युद्ध में विजय होगी।
चौपाई 27
अस्मिन्क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि। एवमुक्त्वा तदाऽगस्त्यो जगाम च यथागतम्॥
Asminkshane mahabaho ravanam tvam vadhishyasi. Evamuktvva tada-agastyo jagama cha yathagatam.
हे महाबाहो, इसी क्षण रावण वध होगा। यह कह अगस्त्य चले गए।
चौपाई 28
एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्तदा। धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान्॥
Etachchrutva mahateja nashtashoko-bhavattada. Dharayamasa suprito raghavah prayatatmavan.
यह सुन महातेजा राघव शोकमुक्त, प्रसन्न और प्रयत्नशील हो गए।
चौपाई 29
आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान्। त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्॥
Adityam prekshya japtva tu param harshamavaptavan. Trirachamya shuchirbhutva dhanuradaya viryavan.
सूर्य देख जप कर परम हर्ष पाया; त्रिराचमन कर शुद्ध हो धनुष उठाया।
चौपाई 30
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत्। सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत्॥
Ravanam prekshya hrishatma yuddhaya samupagamat. Sarvayatnena mahata vadhe tasya dhrito-bhavat.
रावण देख हर्षित हो युद्ध को गए; उसके वध हेतु पूर्ण संकल्प किया।
चौपाई 31
अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः। निशिचरपतिसङ्क्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति॥
Atha raviravadannirikshya ramam muditamanah paramam prahrishyamanah. Nishicharapatisankshayam viditva suraganamadhyagato vachastvareti.
तब सूर्य ने राम को देख, राक्षसराज के विनाश को जान, देवों में से 'शीघ्र करो' कहा।
आदित्य हृदयम् के बारे में
आदित्य हृदयम् हिंदू परंपरा का अत्यंत पवित्र स्तोत्र है, जो भगवान सूर्य को समर्पित है। इसके नियमित पाठ से भक्तों को दिव्य कृपा, मानसिक स्थिरता और नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षा प्राप्त होती है।
- सूर्य ग्रह उपाय: वैदिक ज्योतिष में इस पाठ को सूर्य महादशा, अंतर्दशा या कठिन गोचर के दौरान ग्रह ऊर्जा को संतुलित करने के लिए सुझाया जाता है।
पाठ के लाभ
- सभी शत्रुओं का नाश और जीवन की लड़ाई में विजय
- पाप, चिन्ता, शोक नाश; आयु वृद्धि
- कमजोर सूर्य, सूर्य महादशा, पितृ दोष का सर्वोत्तम उपाय
- रावण वध से पूर्व राम को दिया — सबसे शक्तिशाली सूर्य स्तोत्र
शुभ समय और विधि
रविवार को सूर्योदय पर पूर्व मुख कर पढ़ें। संकट में अगस्त्य के अनुसार तीन बार 31 श्लोक जपें। लाल फूल से अर्घ्य दें। सूर्य अष्टकम् भी देखें।
ज्योतिषीय महत्व
नियमित पाठ मन को धार्मिक अनुशासन से जोड़ता है — जो सभी वैदिक उपायों की नींव है। भय के बजाय ईमानदार आचरण, सेवा और निरंतरता के साथ इसका अभ्यास करें।